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कैसे बने अजित पवार देवेंद्र फडणवीस के अजित दादा, ये है पूरी कहानी

जैसे ही भारतीय जनता पार्टी के देवेंद्र फड़नवीस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजीत पवार ने नए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, फडणवीस के एक पुराने ट्वीट ने ट्विटर और व्हाट्सएप पर वायरल होना शुरू कर दिया।

सितंबर 2014 में- जिसके एक महीने बाद उन्होंने महाराष्ट्र के सीएम के रूप में पदभार संभाला – फडणवीस ने ट्वीट किया था कि बीजेपी “कभी भी एनसीपी के साथ गठबंधन नहीं करेगी”। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में, फडणवीस ने तत्कालीन कांग्रेस-राकांपा सरकार द्वारा कथित रूप से किए गए 70,000 करोड़ रुपये सिंचाई घोटाले को उजागर करने में मदद की थी। सीएम के रूप में कार्यभार संभालने के तुरंत बाद उन्होंने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का माध्यम से इसकी जांच शुरू की।

हालांकि, पिछले दो वर्षों में, दोनों के बीच संबंधों में काफी बदलाव आया है जो विधानसभा सत्रों के दौरान एक-दूसरे के प्रति व्यवहार से स्पष्ट होता है। यह बदलाव कथित तौर पर परिषद में विपक्ष के राकांपा नेता धनंजय मुंडे द्वारा लाया गया है, जो भाजपा के पूर्व वरिष्ठ नेता, दिवंगत गोपीनाथ मुंडे के भतीजे हैं।

“यह सर्वविदित है कि फडणवीस को शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले और पसंद नहीं है और पवार और उनकी बेटी भी फडणवीस को पसंद नहीं करते। परन्तु बहुत लोगों को यह ज्ञात नहीं है कि पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से अजीत दादा और फडणवीस ने आपस में संपर्क स्थापित किया है।” फडणवीस के करीबी एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, जो नाम नहीं बताना चाहते थे।

पार्टी का गठन 1999 में हुआ था और अजित पवार, जो अब 60 वर्ष के हैं, को पार्टी में प्रमुख शरद पवार के बाद नंबर दो के रूप में देखा गया, जो उनके चाचा हैं। शरद पवार के भाई आनंदराव के पुत्र अजीत पहली बार 1991 में राज्य विधानसभा के लिए चुने गए। उन्होंने बारामती विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की देखभाल की। 1999 से पवार राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य रहे, और 2010 में उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि, कथित सिंचाई घोटाले के सार्वजनिक होने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

एनसीपी सुप्रीमो और उनके भतीजे के बीच पिछले कुछ वर्षों में संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं रहे हैं।

अजीत पवार के करीबी सहयोगियों ने कहा कि उन्हें यकीन था कि उनके चाचा उन्हें कभी सीएम नहीं बनने देंगे। “2004 में जब पार्टी ने अपनी सहयोगी कांग्रेस से अधिक सीटें जीतीं और दोनों दलों ने सत्ता बरकरार रखी, तो अजीत मुख्यमंत्री पद चाहते थे। परन्तु पवार ने उस पद को नहीं चुना और उसके बजाय कांग्रेस से दो मंत्री पद अधिक हासिल कर लिया। ‘

सितंबर में, राज्य चुनाव से ठीक पहले अजित पवार ने महाराष्ट्र सहकारी बैंक में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय के एफआईआर में का नाम आने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। बहुतों ने उनसे राकांपा से बाहर निकलने की उम्मीद की। हालांकि, अजित पवार एनसीपी में बने रहे।

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