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संजय गांधी की सनक की वजह से आपातकाल में हुआ ऐसा

हाल ही में आपातकाल की बरसी निकली है। इसके बारे में कई घटनाएं बार बार हमारे सामने आती हैं और कई बार कहानियां छिपी रह जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है दिल्ली में तुर्कमान गेट पर की गयी कार्यवाही की। वैसे तो आपातकाल की बहुत ही गुलाबी तस्वीर  भारत में अब तक कॉंग्रेस सरकार द्वारा  प्रचारित की गयी हैं। आज के युवा के सामने आपातकाल को एक ऐसे समय के रूप में प्रस्तुत किया गया जब सब कुछ ठीक हो गया था, ट्रेनें समय से चलने लगी थीं, कर्मचारी समय से ऑफिस आने लगे थे, भ्रष्टाचार समाप्त  हो गया था और सब कुछ स्वर्ग सा हो गया था। कहा जाए आपातकाल में रामराज्य आ गया था।

मगर जो बातें नहीं  बताई जाती हैं वहहैं अत्याचार की वह कहानियां जो अभी तक अनसुनी हैं, जो अब तक बाहर नहीं आई हैं और जिनके बारे में आज के युवा को नहीं पता है।

नरेंद्र मोदी सरकार में जरा जरा सी बात पर आसमान  सिर पर उठाने वाले कॉंग्रेसी दिल्ली  में आपातकाल के  दौरान तुर्कमान गेट पर किए गए उस जघन्य काण्ड को भूल जाते हैं जिसकी चीखें अब तक वहां पर  गूँज रही हैं, जिसे कॉंग्रेसी कैसे उचित ठहरा पाते हैं, समझ से परे है!

दिल्ली का तुर्कमान गेट आज उसी तरह खड़ा है, मगर उसकी यादों में उस दिन की भी यादें ताज़ा है और सिहरा देती हैं जब अचानक से ही दसियों बुलडोज़र उनके घरों पर चढ़ा दिए गए थे और वह बार बार उन्हें उस विनाश की याद दिलाती हैं जो आपातकाल के दौरान उन्होंने देखा था।

महज़ संजय गांधी की सनक कि तुर्कमान गेट  को तोड़कर वहां पर आलीशान शॉपिंग  मॉल बनाया जाए, और इसके लिए वहां की बस्ती को तोडकर नागरिकों को हटा दिया गया।

न ही उनके लिए किसी तरह के पुनर्वास की व्यवस्था की गयी, और जिन्हें आवास दिए भी गए उन्हें ऐसे स्थानों पर आवास मिले जहाँ पर जंगल ही थे।

जब बुलडोज़र चल रहे तभी  प्रदर्शन करने वाले लोगों पर गोलियां भी चल रही थीं, आज तक  नहीं पता कि कितने लोग मारे गए! कितने लोग  गायब हुए!

आपातकाल की काली रात की यह दास्तां तुर्कमान गेट पर बने एक कमरे के डीडीए फ्लैट्स में रह रहीं बाबू मेराजुद्दीन की वयोवृद्ध पत्नी बबो बताती हैं कि उनके सामने उनके पति और बेटे को पुलिस ने दौड़ाकर पीटा और फिर तिहाड़ जेल में बंद कर दिया और मकान को ढहा दिया गया। पुलिस की लाठियों से मिला दर्द पति को अंत तक सताता रहा।

इसी तरह एक और पीड़ित का कहना है कि उन्हें तिलक नगर थाना में बंद किया। फिर तिहाड़ में। जिन परदे वाली महिलाओं ने बाहर की दुनिया भी  नहीं देखी थी। अचानक उन्हें नंदनगरी जैसे जंगलों में रहने के लिए भेज दिया गया।

अत्याचार की कहानी का अंत यह नहीं है, बल्कि उससे आगे है!

धीरे धीरे आपातकाल के अत्याचार की हर कहानी को सामने आना चाहिए और आपातकाल की गुलाबी तस्वीर को युवाओं के दिमाग से हटाना होगा।

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