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कठिन है आगे की डगर, ये है उद्धव का अब तक का राजनीतिक सफर

58 वर्षीय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के लिए तैयार हैं। एक बार एक अनिच्छुक राजनेता, जिनके परिवार ने पारंपरिक रूप से सरकारों और नागरिक प्रशासनों को रिमोट से संचालित करने की निति अपनाई थी, उद्धव ठाकरे संवैधानिक पद धारण करने वाले पहले व्यक्ति होंगे।

उद्धव ठाकरे के इस कदम से इस तथ्य का संकेत मिल रहा है कि राज्य में भाजपा के बढ़ते वर्चस्व से शिवसेना परेशान हो गयी है और उसे अपने अस्तित्व के ख़त्म हो जाने का डर सताने लगा है।

दिलचस्प बात यह है कि, उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी के दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों से मिलकर सरकार बनाने का दावा किया है। शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जिसके मुखिया शरद पवार उनके परिवार के एक पुराने दोस्त हैं, और सोनिया गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस जिसे पवार को समझाना पड़ा कि शिवसेना को समर्थन देने से उनकी पार्टी की धर्मनिरपेक्ष साख को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

“मुंबई में सोमवार को तीनों पार्टियों के 162 विधायकों को संबोधित करते हुए उद्धव ने कहा कि सभा में उपस्थित सभी लोगों की एक साथ तस्वीर लेने के लिए एक वाइड-एंगल कैमरे की जरूरत होगी।” “हम सत्यमेत जयते में विश्वास करते हैं।“

मीनाताई और बाल ठाकरे के तीन बच्चों में सबसे छोटे, उद्धव ने राजनीति में बहुत देर से प्रवेश किया। उनके चचेरे भाई और एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे को मूल रूप से बाल ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था । वन्यजीव फोटोग्राफी में मुख्य रूप से रुचि रखने वाले, उद्धव ठाकरे का राजनीति से पहला वास्ता 1985 में हुआ जब पार्टी बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में सत्ता में आई।

प्रतिष्ठित जेजे इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से स्नातक ठाकरे, एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर थे  राजनीति में उनकी औपचारिक प्रविष्टि 1990 में हुई जब उन्होंने मुंबई के एक पार्टी कार्यक्रम में भाग लिया। 1988 में उनके पिता राज ठाकरे को पार्टी के युवा विंग प्रमुख के रूप में पहले ही नियुक्त कर चुके थे।

1990 के मध्य से उद्धव और राज के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ी। उद्धव ठाकरे को जनवरी 2003 में कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। विडंबना यह है कि उनकी नियुक्ति के लिए प्रस्ताव राज ठाकरे द्वारा लाया गया था। शिवसेना प्रमुख को अपने चचेरे भाई के साथ कई आंतरिक लड़ाइयां लड़नी पड़ी, जिन्होनें अंततः 2005 में पार्टी का विभाजन कर दिया।

यद्यपि, उनके पास अपने पिता या चचेरे भाई जैसा वक्तृत्व कौशल और आकर्षण नहीं हैं, लेकिन ठाकरे एक चतुर राजनेता हैं। उन्होंने स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ नियमित रूप से बैठकें करके और अपने चारों ओर वफादारों का एक नया समूह बनाकर पार्टी के भीतर अपनी स्थिति को मजबूत किया, साथ में उन्होंने कुछ पार्टी के दिग्गजों से मार्गदर्शन लेना जारी रखा।

2012 में बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद, पार्टी के भीतर ये फुसफुसाहट बढ़ गई कि हल्के माने जाने वाले ठाकरे पार्टी का नेतृत्व नहीं कर पाएंगे। हालांकि, कुछ वर्षों में, ठाकरे ने सभी को गलत साबित कर दिया। वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बढ़ती लोकप्रियता समेत कई कठिन चुनौतियों से निपटने में सफल रहे हैं।

2014 में, मोदी लहर पर सवार होकर, लोकसभा चुनाव जीतने का बाद, भाजपा ने उस साल के विधानसभा चुनावों से पहले शिवसेना के साथ अपना गठबंधन किया। मोदी लहर के दौरान, सेना 63 सीटों को जीतने में कामयाब रही, जो 2009 के चुनावों की तुलना में 21 सीटों की वृद्धि थी। हालाँकि यह महसूस करते हुए कि उन्हें अपने झुंड को एक साथ रखने की अधिक आवश्यकता है, विरोध करने के बजाय वे भाजपा सरकार में शामिल हो गए, भले ही उनकी पार्टी को लगा कि उन्होंने एक कमजोर सौदा किया  है। 2019 में भी, लोकसभा चुनावों से पहले, ठाकरे ने भाजपा के साथ साझेदारी करने का फैसला किया, लेकिन दावा किया कि यह अधिक बराबरी का गठबंधन था।

विधानसभा चुनावों के बाद, जब इस गठबंधन ने सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें हासिल कीं, ठाकरे ने ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री पद के फॉर्मूले को लेकर जोर देना शुरू किया। जब भाजपा ने इससे इनकार कर दिया, तो उद्धव ने अपने प्रतिद्वंद्वियों, कांग्रेस और एनसीपी के साथ एक वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए संपर्क किया।

सरकार बनाने के लिए जोरदार लड़ाई के बाद, ठाकरे अब राज्य के सीएम बनने के कगार पर हैं, हालांकि इसका मतलब होगा तीन दलों का गठबंधन और कांग्रेस और राकांपा के राजनीतिक दिग्गजों से भरे एक कैबिनेट का नेतृत्व करना।

इसके अलावा उनके सामने ये भी चुनौती है कि उन्हें अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाना है। उद्धव ठाकरे ने पार्टी को बचाए रखने में कामयाबी हासिल की, लेकिन अगर उनके पार्टी के वोट शेयर पर नजर डालें तो यह ऊपर नहीं गया। पार्टी का विस्तार नहीं हो रहा है। और उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सरकार पूरा कार्यकाल पूरा करे।

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