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जाति के झूठे नैरेटिव में फंसा रैगिंग का मुद्दा

कहा जाता है कि जब शोर मचाना हो तो ऐसे मचाया जाए कि असली मुद्दे दब जाएं और नकली मुद्दे उठ जाएं। असल में क्या समस्या है वह समझ न आए और हम उन्हीं में उलझे रहें जिनमें वह हमें उलझाना चाहते हैं। पिछले पांच सालों में जब शोर मचाने वाला गैंग हिन्दू और मुसलमान के बीच कोई बहुत बड़ी दीवार न खड़ी पर पाया तो अब वह जाति की दीवार खड़ी करने के लिए उत्सुक है। ऐसा न केवल भविष्य में होने की आशंका है बल्कि हाल ही में हुए पायल तडवी की आत्महत्या वाले  मामले से साबित हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार कमिटी ने जो रिपोर्ट जमा की है उसमें यह कहीं से साबित नहीं होता कि उस पर जातीय कमेन्ट किए गए थे। हाँ यह रैगिंग का मामला है और इसमें कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए।

अख़बार के मुताबिक़ इस रिपोर्ट में यह साफ़ तरीके से कहा गया है कि द्वितीय वर्ष की गायनोकोलोजी की छात्रा डॉ. पायल के साथ तीन सीनियर रैगिंग कर रही थीं, पर उस पर कोई जातीय टिप्पणी नहीं की गयी थी। रिपोर्ट ने पायल पर काफी वर्कलोड और लम्बे काम के घंटों की बात भी कही है।

 मुम्बई में टोपीवाला मेडिकल कॉलेज की छात्रा डॉक्टर पायल तड़वी ने कॉलेज से जुड़े बीवाईएल नायर अस्पताल परिसर में स्थित हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली थी। मई में हुई इस घटना ने एकदम से जातिगत बहस को एक बार आरम्भ कर दिया था। इसके बाद उनकी माँ ने अपनी एक शिकायत में सीनियरों द्वारा प्रताड़ित किए जाने और जातिगत भेदभाव करने का आरोप लगाया था। इसके बाद नायर अस्पताल ने अपनी एक रिपोर्ट में रैगिंग किए जाने की पुष्टि की थी।

यह तो हुई रिपोर्ट की बात, अब आते हैं इस शोर पर कि यह ब्राह्मणवाद का नतीजा है और यह उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों पर किया गया अत्याचार हो रहा है। जैसे ही पायल तडवी की दुखद मृत्यु का समाचार शोर मचाने वाले गिरोह को मिला, उन लोगों की बांछें खिल गईं! यह लोग जैसे गिद्ध की तरह मौकों की तलाश में रहते हैं कि पहले जी भरकर शोर मचा लिया जाए जिससे जब सच्चाई भी सामने आए तो किसी के पास कुछ चर्चा करने के लिए न हो!

 इस रिपोर्ट में 32 लोगों के वक्तव्य सम्मिलित किए हैं, जिनमें डॉक्टर से लेकर, होस्टल के साथियों और तडवी के परिवारीजनों के साथ तीन आरोपी डॉक्टर के भी परिजन सम्मिलित हैं। यह रिपोर्ट रैगिंग से बचने के लिए तमाम तरह के कदम उठाने की सलाह देती है।

 मगर हमारी आदत है कि हम समस्या के मूल में बात नहीं करते, हम शोर में बात करते हैं। यहाँ मुद्दा रैगिंग का था, जातीय अस्मिता का नहीं! मगर इस पूरे मुद्दे को एक गलत रंग देकर भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में शोर मचा दिया गया।  इस विषय में जब हम शोर मचाने वाले गिरोह के ट्वीट आदि देखते हैं तब हमें इस बात की गंभीरता का अहसास होता है कि यह शोर मचाने वाला गिरोह कितना शातिर है।

इस मुद्दे को ब्राहमण पितृसत्ता के साथ जोड़ दिया गया, और इस बहाने एक बार फिर से ब्राहमण और हिंदुत्व को गाली देने की होड़ आरम्भ हो गयी, जो इस गिरोह का काम है ही। मगर जब से इस रिपोर्ट की बात आई है तब से वह शांत है, वह कोई और मुद्दा खोज रहे होंगे! वह मुद्दा बनाते हैं, उसे खूब  उठाते हैं, अपने झूठ के नैरेटिव गढ़ते हैं और फिर सरकार की पूरी ताकत उस झूठे नैरेटिव से लड़ने में निकल जाती है। किसी भी घटना के बाद उसे अपने नैरेटिव की दिशा में मोड़ना इस गिरोह का मनपसन्द काम है। जहां बहस इस बात पर होनी चाहिए थी कि किस तरह से रैगिंग को रोककर अपनी नई पीढ़ी को सुरक्षित करें, वहीं इस गिरोह के कारण यह केवल और केवल जाति के झूठे नैरेटिव में फंस गया।

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