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नरेंद्र मोदी सरकार का भ्रष्टाचार पर वार

नरेंद्र मोदी सरकार कुछ मुख्य वादों के साथ आई थी, जिनमें एक था भ्रष्टाचार पर वार! यह तथ्य स्वयं में सत्य है कि प्रधानमंत्री मोदी तथा उनके किसी भी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई सीधा आरोप नहीं है और यह भी उतना ही सच है कि जनता के मध्य प्रधानमंत्री की छवि साफ़ सुथरी है।

सरकार ने अपने इसी वादे पर अमल करते हुए कल बड़ी कार्यवाही की और करीब एक दर्जन वरिष्ठ कर अधिकारियोंको उनके पदों से हटा दिया। उन पर भ्रष्टाचार से लेकर आय से अधिक संपत्ति तक के आरोप थे। उनमें से कई अधिकारीयों को कार्य न करने के कारण भी आवश्यक सेवानिवृत्ति लेने के लिए बाध्य किया गया।

इन अधिकारियों में आयुक्त, अवर आयुक्त पद तक के अधिकारी हैं।

इन अधिकारियों पर यह कार्यवाही जनहित आधार पर वित्त मंत्रालय द्वारा नियम 56जे लगाने के कारण हुई है। ऐसा नहीं था कि ऐसा नियम पहले नहीं था, बल्कि यह नियम काफी समय से है परन्तु आज तक जन हित का हवाला देते हुए किसी को भी ऐसा निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं किया गया था।

 प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार को लेकर अपना सख्त रूप पहले भी दिखा चुके हैं, और यह बात उनके हर निर्णय में परिलक्षित होती है। मंत्रियों को भी अपने अपने विभागों में उन अधिकारियों की पहचान करने का कार्य दे दिया गया है जो प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं।

इन अधिकारियों को तीन माह तक वेतन एवं भत्ता मिलेगा परन्तु उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिलेगा। शायद यह भ्रष्ट अधिकारियों के लिए मोदी सरकार का स्पष्ट सन्देश है कि या तो कार्य करें या नौकरी से बाहर होने के लिए तैयार रहें। जिसका जितना बड़ा पद उतना ही बड़ा उसका उत्तरदायित्व होता है। एवं ऐसे में उच्च पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को अपने आचरण में सत्यनिष्ठा एवं देश के प्रति ईमानदारी का पालन करने की आवश्यकता होती है।

इन अधिकारियों में शामिल हैं, बीबी राजेन्द्र प्रसाद, आलोक कुमार मित्रा, अजय कुमार सिंह, बी अरुलप्पा, विवेक बत्रा आदि!

यदि सरकार का यह कदम वाकई भ्रष्टाचार के विरुद्ध है तो अब यह तय है कि इन अधिकारियों के प्रति भी कदम उठाने की शुरुआत हो गयी है।

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