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एक देश एक चुनाव, क्यों है कांग्रेस का विरोध

सुधार के कुछ मुद्दों पर आई सरकार ने चुनाव सुधार को लेकर एक कदम बढ़ा दिया है। सरकार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराना चाहती है। इस मुद्दे पर भाजपा का स्टैंड हमेशा से स्पष्ट रहा है और प्रधानमंत्री मोदी लगातार इसकी वकालत करते हुए आए हैं। अब इस मुद्दे पर सरकार ने बैठक बुलाई थी जिसमें सभी दलों को आमंत्रित किया था, कई छोटे दल सरकार द्वारा बुलाई गई इस बैठक का हिस्सा बने मगर देश में सबसे ज्यादा वर्षों तक शासन करने वाली कोंग्रेस ने इस बैठक से किनारा कर लिया। आखिर उसने इस बैठक से किनारा क्यों किया, कोई भी इस बात को समझ नहीं पा रहा है।

सरकार का तर्क है कि भारत में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं इसलिए भारत हमेशा ही चुनावी मोड में होता है और यही कारण है कि कई योजनाएं प्रभावित होती रहती हैं। कभी किसी चुनाव के कारण सरकार कोई कदम नहीं उठा पाती तो कभी किसी? हर समय चुनावी मोड में बने रहने से खर्च भी बहुत होता है, परियोजनाओं की संकल्पित एवं वास्तविक लागतों में अंतर हो जाता है। सरकार प्रशासन पर भी ध्यान नहीं दे पाती है और जन समस्याओं पर भी ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाती है। यही कारण है कि सरकार एक देश एक चुनाव के पक्ष में है।

हालांकि कांग्रेस सहित कई अन्य दल इस पक्ष में नहीं दीखते हैं। उसके पीछे उनके अपने तर्कों में से मुख्य तर्क यह है कि इससे केंद्र में सत्तारूढ़ दल को लाभ होगा और मत देते समय जनता एक ही पार्टी को वोट देना चाहेगी।

परन्तु यदि इस बार लोकसभा के साथ हुए ओडिशा और आंध्रप्रदेश में हुए विधानसभा के चुनावों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि विपक्षी दलों का यह डर पूरी तरह से झूठा है। क्योंकि जहाँ नरेंद्र मोदी की सुनामी में बड़े बड़े दल उखड़ गए वहीं विधानसभा चुनावों में भाजपा दोनों ही राज्यों में कहीं नहीं आई। अब लोग इस विधानसभा और लोकसभा के बीच मुद्दों के अंतर को पहचानने लगे हैं और इसी के साथ स्थानीय एवं देश के नेतृत्व के विषय में भी स्पष्ट हैं, उन्हें अपने प्रधानमंत्री के रूप में भी कौन चाहिए और मुख्यमंत्री के रूप में कौन, उन्हें स्पष्ट पता है तो इस बारे में विपक्षी दलों को किसी भी प्रकार से भयभीत नहीं होना चाहिए। उन्हें अपनी आशंका को झाड़ देना चाहिए। मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है, ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि विपक्षी दल अपनी ही नीतियों को लेकर आशान्वित नहीं हैं।

ऐसा भी नहीं है कि भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ नहीं हुए, यह पहले हो चुका है इसलिए ऐसा कुछ नहीं है कि यह सरकार कोई नया कदम उठाने जा रही है या कुछ और!

आज़ादी के बाद देश में पहली बार 1951-52 में चुनाव हुए थे। तब लोकसभा चुनाव और सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी चुनाव एक साथ कराए गए, लेकिन फिर ये सिलसिला टूट गया है!

परन्तु कांग्रेस का इस तरह नीतिगत मुद्दों से दूर भागना समझ से परे है क्या वह अब भी जनता से उतना ही दूर रहना चाहती है, जितना वह हो गयी है? तय कोंग्रेस को करना है!

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