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आपातकाल से जुडी ये बातें, वो काला दिन

आज का दिन बहुत ख़ास है, बहुत यादगार है और यह इसलिए भी यादगार होना चाहिए, क्योंकि आज ही के दिन वह कदम उठाया गया था जिसने विपक्ष को संजीवनी दी थी और जिसने विपक्ष को सत्ता के खिलाफ एकजुट किया था। जिस संजीवनी की तलाश में तमाम विपक्षी नेता बरसों से लगे हुए थे, वह उन्हें आज से 44 वर्ष पहले अपनी सनक में किए गए एक फैसले ने इंदिरा गांधी ने दे दी थी।

आज से 44 वर्ष पहले जब कुछ लोग सोकर उठे, तो उन्हें पता चला कि उनके मूलभूत अधिकार ही उनसे छीन लिए गए हैं और अब वह आपातकाल में रह रहे हैं। इस घोषणा ने आम जनता सहित विपक्षी नेताओं के मध्य एक असंतोष उत्पन्न कर दिया।  

जब 1975 में देश पर आपातकाल थोपा गया था तो उसके पीछे खुद को बचाने का एक कारण था। हुआ यह था कि उच्च न्यायालय के एक फैसले ने इंदिरा गाँधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया और उन पर छ सालों तक कोई भी पद सम्हालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इस फैसले से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तिलमिला गईं और उन्होंने इस फैसले को मानने से इंकार करते हुए देश पर ही आपातकाल थोप दिया।

दरअसल इंदिरा गाँधी पर उनके प्रतिद्वंदी राज नारायण ने यह आरोप लगाया था कि इंदिरा गाँधी ने उन्हें हराने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया है, तय सीमा से अधिक खर्च किया है और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। हालांकि इंदिरा गाँधी ने इन सभी आरोपों को गलत बताया और अदालत में अपना पक्ष रखा। हालांकि अदालत इन सफाइयों से प्रभावित नहीं हुई और इंदिरा गाँधी को दोषी ठहराते हुए उनपर छ साल तक कोई पद संभालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

यहीं से शुरू होती है असली असहिष्णुता की कहानी। जिस असहिष्णुता पर आज लोग आन्दोलन कर रहे हैं, उन्हें उस काल की असहिष्णुता की कहानी याद होनी चाहिए और उन्हें यह याद रखना चाहिए कि यह कोंग्रेस का मूल चरित्र है जो अपना विरोध स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होता। जिसे यह सहन ही नहीं हो पाता कि कोई उसके विरोध में खड़ा हो। यही कारण है कि जब फैसला इंदिरा गाँधी के खिलाफ आया तो उन्होंने पूरे भारत के नागरिकों के ही अधिकारों पर डाका डाल दिया।

राजनीतिक जानकार कहते हैं कि उस समय कोंग्रेस पार्टी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर काफी विमर्श किया, और सोचा कि क्या किया जा सकता है, मगर कोई नतीजा  नहीं निकला और इंदिरा गाँधी के अस्तित्व के बिना कोंग्रेस पार्टी अस्तित्वहीन हो जाती। इसलिए पार्टी पूरी तरह से इंदिरा गाँधी द्वारा उठाए गए इस अलोकतांत्रिक कदम के साथ खड़ी रही और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के दमन पर साथ रही।

इस फैसला आने के 11 दिनों के बाद 23 जून को इंदिरा गाँधी ने इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हुए अनुरोध किया कि उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई जाए। हालांकि उन्हें पूरी तरह से राहत नहीं मिली। और यही वह समय था जब सारा विपक्ष एकजुट हो रहा था। लोकनायक जेपी नारायण पूरे विपक्ष के अगुआई कर रहे थे।

विपक्ष के बढ़ते प्रभाव और न्यायालय के फैसले से बचने के लिए इंदिरा गांधी ने जो कदम उठाया, वह इस लोकतंत्र का सबसे काला दिन है, और वह वर्ष लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय हैं।

हालांकि इंदिरा गाँधी ने इसे उचित ठहराते हुए अपील की कि वह देश को बचाने के लिए यह कदम उठा रही हैं। आपातकाल लागू होते ही विपक्षी नेताओं को मीसा क़ानून के तहत जेल में ठूंसा जाने लगा जिनमें जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फ़र्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे।

हालांकि जो लोग आज के हालातों को आपातकाल कहते हैं, उन्हें एक नजर इंदिरा गाँधी द्वारा उठाए गए क़दमों पर डालनी चाहिए जहाँ हर नागरिक अधिकार का हनन किया गया था और इंदिरा गाँधी के पुत्र संजय गांधी द्वारा किए गए अत्याचारों को तो जरा भी नहीं भूलना चाहिए। समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध को भी नहीं भूलना चाहिए।

आज तो प्रधानमंत्री को चोर कहने वाले या प्रधानमंत्री को गाली देने वाले लोग भी सम्मानित हो रहे हैं, और प्रधानमंत्री को जीभर कर गाली देने वाले लोग उस आपातकाल से आज की तुलना करते थे जहां पर सरकारी अधिकारीयों की ही बात न मानने पर जेल में डाल दिया जाता था।

अब लगता है आपातकाल और आज के समय की तुलना कर ही लेनी चाहिए

सोनाली मिश्रा

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