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बलात्कार पीड़िता को है गर्भपात का अधिकार

भारत में बलात्कार एक बहुत ही आम शब्द है और हमें रोज़ ही किसी न किसी लड़की के साथ बलात्कार की घटना सुनाई पड़ जाती है। यह जितना आम शब्द है उतना ही कानों और आत्मा के लिए कष्टकारी भी। जैसे ही हम यह शब्द सुनते हैं वैसे ही हम एक अनजान भय से भर जाते हैं। हमारी आत्मा उस लड़की पर हुए अत्याचार को महसूस कर सहम जाती है। जैसे तैसे इस अत्याचार से उबरी लड़की सामाजिक बहिष्कार आदि झेल कर आगे बढ़ने की कोशिश करती है और फिर यदि उसे पता चले कि वह गर्भवती है और उसके गर्भ में उन्हीं दरिंदों का बच्चा है फिर क्या करेगी वह? कहाँ जा सकती है? अंतत: कहीं तो जाना ही होगा, उसके सामने गर्भपात के अलावा कोई चारा नहीं रहता, परन्तु उसमें कई कानूनी अडचनें रहती हैं। जहां सरकार ने इस विषय में पहले से ही यह स्पष्ट कर रखा है कि यदि भ्रूण की अवस्था 20 सप्ताह से कम है तो पीड़िता को किसी भी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश नहीं किया जा सकता है और गर्भपात को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम की धारा 3 के अनुसार किया जा सकता है।

मगर हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय के सामने एक ऐसा मामला आया जिसमें न्यायालय ने इन दिशानिर्देशों को फिर से स्पष्ट करने के लिए कहा। न्यायालय के सामने आए मामले में बलात्कार पीड़ित ने न्यायालय से गर्भपात के लिए अनुमति दिए जाने का अनुरोध किया जबकि वह आठ सप्ताह की ही गर्भवती थी।  जब उसने पुलिस के साथ  आपराधिक मामला दर्ज कराया तभी उसने आठ  सप्ताह के गर्भ की सूचना डी थी। उसके बाद उसे इंस्टीटयूट ऑफ ओब्स्टेट्रिक्स एंड गायनाकोलोजी, एग्मोर  में गर्भपात के लिए भर्ती । संस्थान पुलिस के साथ बात कर गर्भपात के लिए भी तैयार हो गया, मगर फिर उसे बिना गर्भपात के ही भेज दिया गया। न्यायालय ने आदेश दिया कि उसे दूसरे अस्प्ताल में भर्ती कराया जाए, मगर अस्पताल ने इस आदेश का पालन करने के स्थान पर पीड़िता को राजीव गांधी सरकारी अस्पताल में गर्भपात के लिए मेडिकल सहायता के लिए गठित बोर्ड के पास भेज दिया, और पुलिस ने इस मामले में कुछ और आगे फॉलोअप नहीं किया और पीड़िता का गर्भपात न हो सका।

बाद में जब यह मामला उच्च न्यायालय में पहुंचा तो न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को राजीव गांधी सरकारी अस्पताल में भर्ती होने का आदेश दिया और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि गर्भपात के लिए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

इस मामले से यह तो समझ आता है कि सरकार और न्यायालय ने बलात्कार पीड़ितों के लिए कई तरह के नियम और क़ानून बना कर रखे हुए हैं, मगर क्यों बलात्कार पीड़ितों के लिए उन्हें पा पाना कठिन होता है? जब स्पष्ट दिशानिर्देश है तो वह क्या मानसिकता है जो इन दिशानिर्देशों का पालन करने से रोकती है। इस मामले में भी पीड़िता को न्यायालय से राहत मिली, परन्तु यदि राहत नहीं मिल पाती तो क्या होता? यदि समय आगे बढ़ गया होता तो?

यह तो हालांकि कई तहों में है, हमें महिला अधिकारों की बात करते हुए इस पहलू पर भी सोचना होगा।

डॉ. सोनाली मिश्रा

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