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एक देश एक विधान, कब पूरा होगा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ये स्वप्न

बंगाल की धरती ने न जाने कितने क्रांतिकारियों को जन्म दिया है। बंगाल की धरती में ही विद्रोह है। स्वतंत्रता से पूर्व बंगाल की धरती ने न जाने कितने ऐसे सपूतों को जन्म दिया जिन्होनें अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बिगुल फूँका और हर तरह से अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष किया। परन्तु यह धरती ऐसी भी है जिसके हिस्से में स्वतंत्र भारत के प्रथम शहीद का भी श्रेय है। जिसने एक देश एक विधान के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं की और देश की अखंडता को लेकर अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

वह वीर सपूत थे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी! जिनकी मृत्यु आज तक एक रहस्य है। जिन्होनें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा कश्मीर को दिए गए विशेषाधिकार का विरोध किया और नारा दिया कि एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे।

जिन दिनों देश आज़ादी के खुमार में था और पूरे भारत में एक से नियम लागू होने थे, उन्हीं दिनों भारत के एक हिस्से को अलग करने के लिए एक षड्यंत्र हो रहा था। नेहरू और शेख अब्दुल्ला मिलकर एक ऐसी साज़िश की योजना बना रहे थे, जो जम्मू और कश्मीर को भारत से अलग कर देता, जबकि नेहरू पहले ही जम्मू और कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बता चुके थे। यदि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था तो उसे अलग और विशेष दर्जा किस खुशी में दिया जा रहा था, यह कोई नहीं बता पा रहा था। धारा 370 लागू होने वाली थी और इस धारा से श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विरोध था।

उस समय भारतीय संविधान की धारा 370 में यह प्रावधान किया गया था कि भारत सरकार जब तक परमिट जारी नहीं करेगी तब ता कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। डॉ. मुखर्जी देश में चलने वाले इस विधान के खिलाफ थे। उनका कहना था कि जब भारत में एक देश और एक विधान की बात हो चुकी है तो आखिर इस भेदभाव का कारण क्या है? वह इस भेद्भाव के सख्त खिलाफ थे, उन्होंने कहा कि, “नेहरू जी ने ही ये बार-बार ऐलान किया है कि जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत में 100% विलय हो चुका है, फिर भी यह देखकर हैरानी होती है कि इस राज्य में कोई भारत सरकार से परमिट लिए बिना दाखिल नहीं हो सकता। मैं नही समझता कि भारत सरकार को यह हक़ है कि वह किसी को भी भारतीय संघ के किसी हिस्से में जाने से रोक सके क्योंकि खुद नेहरू ऐसा कहते हैं कि इस संघ में जम्मू व कश्मीर भी शामिल है।”

और उन्होंने यह तय किया कि वह भारत सरकार से परमिट लिए बिना खुद ही जम्मू और कश्मीर जाएंगे। इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से खुद को वाकिफ करा पाएं। उन दिनों देशभक्त डोगरा समुदाय को तत्कालीन शेख अब्दुल्ला की सरकार द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा था।  जबकि यह डोगरा समुदाय ही था जो शेख अब्दुल्ला के जुल्म के आगे तन कर खड़ा हुआ था।

डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए 8 मई 1953 को सुबह दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकल पड़े। उनके दिल में एक ही जूनून था, पूरे भारत को एक करने का, पूरे भारत के लिए एक विधान का!

वह जहां भी जाते, लोगों का एक हुजूम उनकी एक झलक देखने के लिए मचल उठता। डॉ। मुखर्जी ने जालंधर के बाद बलराज मधोक को वापस भेज दिया और फिर उन्होंने अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। रस्ते में भी उन्हें पकड़ने के लिए एक दो अधिकारी आए, परन्तु उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया। कहा जाता है कि अमृतसर पर उनका स्वागत करने के लिए 20000 लोग उपस्थित थे।

गुरदासपुर के डिप्टी कमिश्नर के पास उन्हें गिरफ्तार न किए जाने के आदेश आए, शायद लोग उन्हें भारतीय क़ानून की सीमा से बाहर ले जाना चाहते होंगे। जब वह विरोध न कर पाएं। जैसे ही उन्होंने कश्मीर में प्रवेश किया, उन्हें पकड़ लिया गया और उन्हें कैद में डाल दिया गया। जहां से उनकी निर्जीव्व देह ही वापस आई।

श्री मुखर्जी ने एक देश एक विधान के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं की, वह अपने जीतेजी देश का दूसरा विभाजन नहीं चाहते थे।

उनकी मृत्यु के उपरान्त देश में एक असंतोष उत्पन्न हुआ और नेहरू के खिलाफ असंतोष उत्पन्न हुआ। जिस कारण दो झंडे और दो संविधान वाला प्रावधान समाप्त किया गया।

आज उनकी पुण्यतिथि है, आज उनके स्वप्न को पूरा करने के लिए हर देशवासी कृत संकल्प है।

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