ताज़ा खबर

ताज़ा खबर
• बैलगाड़ी से चंद्रयान तक का सफर
• कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार विधानसभा में विश्वास मत हार गई
• सोनभद्र तक पहुँची प्रियंका वाड्रा मध्य प्रदेश कब आएंगी?
• आयकर भरने की समय सीमा 31 अगस्त तक बढ़ी
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने आया “एक बहुत ही खास मित्र”
• रात को दें अपने पेट को आराम!
• क्या योग और ध्यान ने दिलाई इस साल के विम्बलडन विजेता को ट्रॉफी?
• आईपैड नहीं किताबें चाहिए
• प्रज्ञा ठाकुर को अपनी टॉयलेट टिप्पणी के लिए कार्यकारी बीजेपी अध्यक्ष ने लताड़ा
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को चंद्रयान -2 के सफल प्रक्षेपण पर बधाई दी
• इसरो ने श्रीहरिकोटा से चंद्रयान -2 को प्रक्षेपित किया
• राहुल गांधी कांग्रेस के कैप्टन हैं और आगे भी रहेंगे- अशोक गहलोत
• कर्नाटक के ट्रस्ट वोट के बीच भाजपा और जेडीएस विधायकों ने अपने-अपने होटलों में योग कर किया तनाव दूर
• क्या अभी तक जाति के जाल में फंसे हैं वाम दल?
• केरल की सरकार को भारतीय रीति-रिवाजों से इतनी नफरत क्यों?

मोबाइल फोन से सुलगता बचपन

आज हर हाथ में एक स्मार्ट फोन है और हर स्मार्टफोन धारक खुद को स्मार्ट समझता है। इसलिए नहीं कि वह अच्छा बोल पाता है बल्कि इसलिए क्योंकि वह एक कथित स्मार्ट फोन का मालिक है और वह जब इस स्मार्ट फोन हाथ में लेता है तो वह अपनी ही एक दुनिया में खो जाता है और उसे फिर किसी से कोई मतलब नहीं रहता। वह अपने मन का गाना सुनता है, वह अपने मन की फिल्म या सीरियल देखता है और कुछ गलत होने पर अपना फोन निकाल कर वीडियो बनाता है, मगर मदद नहीं करता। और जब आजकल बस या मेट्रो में छोटे छोटे बच्चे भी फोन की इस बीमारी का शिकार होते हैं। जैसे ही कहीं बैठे वह फोन में खेलने लगे! आखिर वह क्या आदत है जो एकदम बच्चों को इसका गुलाम बना देती है। आखिर वह क्या है जिसके कारण बच्चे फोन के दीवाने हो जाते हैं।

उनमें एक ख़ास प्रकार की लत लग जाती है, और यह लत कोई मामूली लत न होकर खास होती है, एक ऐसी लत जो आपके बच्चे को बर्बाद कर देती है। हाल ही में independent.co.uk में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अपने बच्चे को स्मार्टफोन देना उन्हें एक ग्राम कोकीन देने के समान है। यदि इस खबर पर भरोसा किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि स्मार्टफोन बच्चों के दिमाग को अपनी लत लगा देते हैं। जैसे कोकेन धीरे धीरे दिमाग में भीतर जाकर हमारे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है, उसी प्रकार फोन भी हमारे बच्चों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। और यह इस हद तक प्रभावित कर देता है कि किशोर उम्र की लडकियां अपनी नग्न तस्वीरें भी व्हाट्सएप पर शेयर करने से हिचकती नहीं है। इस रिपोर्ट को तैयार किया है शीर्ष एडिक्शन विशेषज्ञ मैंडी सलिगरी ने!

इन्होनें तमाम तरह की स्थितियों पर बात की है। वह कहती हैं कि स्नैपचैट और इन्स्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर दोस्तों के साथ मेसेज करना भी उतनी ही नशीली आदत हो सकती है जितना कि कोकेन लेना। और वह दिमाग पर उसी के जैसे असर करती है, इसका इलाज बिलकुल उसी तरह से होना चाहिए जैसे हम ड्रग और शराब पीने का करते हैं। वह हमारे तंत्रिका तन्त्र पर प्रहार करता है और उसे अपना गुलाम बनाता है।

उनकी इस बात को इस रिपोर्ट से और बल मिला जिसमें ब्रिटेन के 12 से 15 साल के एक तिहाई बच्चों ने यह स्वीकारा कि वह स्क्रीन के समय और अन्य गतिविधियों में अंतर नहीं रख पाते हैं।

लन्दन में हर्ली स्ट्रीट चार्टर क्लीनिक की प्रमुख सालिगरी ने कहा कि 16-20 साल के एक तिहाई बच्चों के अभिभावक अपने बच्चों के इलाज के लिए उनके पास आते हैं, कि उनके बच्चे किस प्रकार से असामान्य व्यवहार कर रहे हैं।

इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि  1500 से अधिक शिक्षकों के हुए सर्वे में लगभग दो तिहाई शिक्षकों ने यह स्वीकारा कि वह जानते हैं कि उनके स्टुडेंट यौन सामग्री का आदान प्रदान कर रहे हैं, और हर छ में से एक बच्चा प्राइमरी शिक्षा ही ले रहा है।

और किशोर लडकियां इस बात से बिलकुल भी नहीं डरती कि किसी को अपनी नग्न तस्वीर भेजना गलत है, वह इसे तब तक सही मानती हैं, जब तक अभिभावक न देखें। उनमें आत्मसम्मान की भावना कम होती जा रही है।

यदि भारत की बात करें तो यहाँ भी कमोबेश यही हालात दिखते हैं। मेट्रो में चलते हुए, पार्कों में चलते हुए और यहाँ तक कि मॉल में भी लोग अपने साथी के स्थान पर फोन में अधिक समय बिताते हैं। बच्चे जब अपने अभिभावकों को फोन पर समय बिताते हुए देखते हैं तो उन्हें लगता है कि यही एक मनोरंजन का साधन है और वह बार बार उसी तरफ खिंचे चले जाते हैं।

बच्चों की मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए कुछ उपाय किए जाने अत्यंत ही आवश्यक हैं जैसे:

  1. अभिभावकों को सबसे पहले स्वयं बदलाव लाना चाहिए। खुद भी दिन भर फोन से चिपके रहने की आदत छोड़ें और घर परिवार के साथ समय बिताएं, जब भी घर पर रहें तो बच्चों के संग रहें।
  2. बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार किसी हॉबी क्लास ले जाएं। जैसे डांस, गाना, कोई गेम आदि।
  3. बच्चों से घर के कामों में हाथ बंटाने को कहें।
  4. यदि लैपटॉप बच्चा इस्तेमाल कर रहा है तो इंटरनेट को जीमेल एकांउट से कनेक्ट रखें जिससे आप देख पाएं कि बच्चा क्या कर रहा है, क्या देख रहा है।

बच्चों की गेमिंग की लत को पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मानसिक विकार घोषित किया जा चुका है।

आज के डिजिटल युग में बच्चों को साथ की आवश्यकता है, अपनों के साथ की, और जरूरी है कि उसे वह साथ हम सभी प्रदान करें, न कि उसे फोन का आसान शिकार बना दें!

Related Articles