ताज़ा खबर

ताज़ा खबर
• जन्मदिन की वार्षिक भविष्यवाणी (13th July, 2018)
• आर्थिक राशिफल (13th July, 2018)
• अंकों से जानें, कैसा होगा आपका दिन (13th July, 2018)
• टैरो राशिफल (13th July, 2018)
• राशिफल (13th July, 2018)
• मोदी सरकार का फैसला, अब पर्यटन स्थलों पर खींचिए मनचाही फोटो
• पीएम मोदी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नए मुख्यालय भवन का किया उद्घाटन
• पीएम मोदी ने नमो एप के जरिए की स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों से बातचीत, महिला सशक्तिकरण को बताया सरकार की प्रतिबद्धता
• किसानों की आमदनी दोगुना करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध- पीएम मोदी
• अमित शाह ने की झारखंड में चुनाव तैयारियों की समीक्षा
• जन्मदिन की वार्षिक भविष्यवाणी (12th July, 2018)
• अंकों से जानें, कैसा होगा आपका दिन (12th July, 2018)
• टैरो राशिफल (12th July, 2018)
• राशिफल (12th July, 2018)
• हमारी सरकार किसान कल्याण के लिए प्रतिबद्ध- पीएम मोदी

आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों में इतनी बेचैनी क्यों है?

किसी भी देश का प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रधानमंत्री होता है, किसी एक का नहीं! किसी एक दल के प्रतिनिधित्व के स्थान पर वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है, शायद नरेंद्र मोदी के मामले में यह कुछ लोगों की प्रतिक्रिया से प्रतीत नहीं होता है। मई 2014 में, जब से यह सरकार बनी है, तब से नरेंद्र मोदी निशाने पर हैं, वे कुछ बुद्धिजीवियों के निशाने पर हैं। रोज़ ही कुछ लोग उनके खिलाफ फतवा जारी करते हैं, और बाद में कुछ असहिष्णुता का रोना रोते हैं। आखिर यह असहिष्णुता का रोना और राग किसलिए? क्या इसलिए कि आपके मन का व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना? साहित्यकार या पत्रकार हमेशा ही जनता का होता है, और वह जनता के ही प्रयासों के फलस्वरूप किसी पद पर आसीन हो पाता है, यदि जनता उन्हें न पढ़े तो उनका क्या हश्र होगा, यह सभी को पता है, फिर भी जनता के द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री के खिलाफ हमेशा ही उलटा-सीधा बोलकर वे उस बात का गुस्सा निकालते रहते हैं कि आखिर जो इतने वर्षों से हो रहा था, वह हो क्यों नहीं रहा? आखिर उनके हाथ से बाज़ी गयी कहाँ है? दरअसल सोशल मीडिया पर गाली देने का जो ट्रेंड शुरू हुआ है, वह न जाने किसकी उपज है या किसके कारण है यह सोचना होगा? क्या होगा यदि सभी लोग इस गालीगलौज में शामिल हो जाएँगे? जो यह विरोध किसका है? क्या यह विरोध व्यक्ति का है, विचारधारा का है? या किसका है? समस्या यह है कि वर्ष 2002 से जिस व्यक्ति का अनवरत विरोध हो रहा हो , जिसके विरोध में लम्बे-लम्बे आख्यान लिखे जाएं, जिसके दूसरे देश में जाने को लेकर तमाम तरह की रुदालियाँ हों, और पत्रकारों और साहित्यकारों की एक पूरी की पूरी जमात केवल और केवल उसके विरोध के चलते ही अपना घर बसा ले जाए, वह इन सब षड्यंत्रों के कुचक्र को तोड़ता हुआ एक दिन वह देश के सबसे ऊंचे पद को केवल अपने काम के माध्यम से हासिल कर लेगा, यह उन लोगों के गले नहीं उतर रहा है। कल  मृणाल पांडे का ट्वीट हो या फिर मनीष तिवारी का! ये लोग एक निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए शिष्ट शब्दावली क्यों प्रयोग नही कर पा रहे हैं? राजनीतिक विरोध अपनी जगह है और इस तरह का विरोध अपनी जगह! बहुत सरल है किसी को भी भक्त कह देना, मगर सबसे बड़े भक्त तो वे लोग हैं, जो दिन और रात मोदी का नाम लेते रहते हैं! जिस प्रकार रावण और कंस अपने मोक्ष के लिए हर समय राम और कृष्ण का नाम लेते रहते थे, उसी प्रकार कुछ लोगों के दिन की शुरुआत ही मोदी को कोसने के साथ होती है!

जहां अभी तक केवल रविश कुमार और दिग्विजय सिंह को ही अपशब्दों के जनक की सूची में रख सकते थे, मगर अब दिनों दिन नए नाम जुड़ते जा रहे हैं, कल नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन पर जहां एक तरफ हर तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाइयां दी जा रही थीं, तो वहीं, उसी समय कुछ ऐसे भी लोग थे जो नरेंद्र मोदी को कोस रहे थे। उनमें से एक थी पूर्व संपादिका मृणाल पाण्डेय जिन्होनें नरेंद्र मोदी पर बहुत ही आपत्तिजनक ट्वीट किया। जब उनका विरोध हुआ तो उन्होंने विरोध करने वालों को ही ब्लाक कर दिया। दूसरा ट्वीट था कॉंग्रेसी नेता मनीष तिवारी का।

जहाँ तक समाज व राजनीति की बात है तो दोनों ही क्षेत्रों में में धैर्य, शूचिता बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। आज भले ही कोई आधुनिक युग का हवाला देकर इन बातों को दरकिनार कर दे लेकिन खासकर भारतीय समाज में कोई भी इसके सामाजिक-धार्मिक महत्व को कम करके आंकने की जुर्रत नहीं कर सकता। इसका असर ठीक वैसे ही है जैसे बिना लाठी मारे चोट लग जाना। कॉंग्रेस की हालत इन दिनों सब देख ही रहे हैं, प्रधानमंत्री की निंदा करते-करते वे कब देश विरोधी हो गए उन्हें पता भी नहीं चला। ऐसे में कुछ संपादकों का वैचारिक पतन भी एक खतरे की घंटी है। गौरतलब है कि कुछ ऐसे कार्यों से ही भाजपा को शक्ति मिलती है, कई बार तो ऐसा लगता है कि ये लोग बाहर रहकर भाजपा के लिए काम करते हैं।

जब मनीष तिवारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपने आधिकारिक ट्वीटर पर ट्वीट किया उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में सरदार सरोवर बांध का लोकापर्ण कर रहे थे। मगर यह भी ध्यान रखना होगा कि ये वही मनीष तिवारी हैं जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे को अपशब्द कहा था। उसके बाद चुनाव में किस तरह से कांग्रेस की हालत हुई थी यह हम सभी जानते हैं। इसी प्रकार मणि शंकर अय्यर को चायवाला शब्द कितना भारी पड़ा, यह हम सबने देखा है!

विरोध की भाषा संतुलित रहे, विरोध की भाषा संयम की भाषा हो तभी विरोध सार्थक होगा।

– सोनाली मिश्रा

Related Articles