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इन सात कारणों ने की उद्धव की मुख्यमंत्री बनने में मदद, साथ में काम आयी फडणवीस की ये सात गलतियां

कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और शिवसेना जैसी वैचारिक रूप से भिन्न पार्टियां महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए साथ आयी हैं। वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा अपने जनादेश ख़त्म हो जाने के डर से प्रेरित हैं, और यही कारण है उन्हें अगले पांच वर्षों तक साथ रख सकता है।

शिवसेना पिछले कुछ समय से इस बात से डरी हुई है कि भाजपा के साथ उसके लंबे गठबंधन के कारण वह उसकी छाया से उभर नहीं पायी। यह देखते हुए कि भाजपा और सेना वैचारिक रूप से समान हैं, शिवसेना को यह भी डर था कि भाजपा भविष्य में शिवसेना के वोटरों को अपनी ओर कर लेगी जैसा कि उसने गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में किया है।

कांग्रेस और राकांपा को स्पष्ट रूप से लगता था कि अगर वे अब सत्ता पर काबिज नहीं हुए, तो भाजपा राज्य और केंद्र दोनों की राजनीति पर हावी हो जाएगी और वे खत्म हो जाएंगे। भाजपा के पास विपक्ष को कमजोर करने और उसे अप्रासंगिक बनाने का ट्रैक रिकॉर्ड है। महाराष्ट्र विधानसभा के कांग्रेस के निर्वाचित सदस्यों ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को आश्वस्त किया कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को  शिवसेना के साथ अपने वैचारिक मतभेदों को अलग रखना होगा और भाजपा को रोकने के लिए एक मौकापरस्त गठजोड़ में प्रवेश करना होगा।

किसानों का मुद्दा कांग्रेस और एनसीपी के लिए एक वरदान साबित हुआ, जिसमें दोनों के पास महत्वपूर्ण ग्रामीण जनादेश है। एक समुदाय के रूप में किसानों का राज्य के दो-तिहाई से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में काफी प्रभाव है। शिवसेना शहरी केंद्रित है, जबकि केंद्र और राज्य दोनों में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद, कांग्रेस पिछले 30 वर्षों में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव भी नहीं जीत पाई है। NCP भी मुंबई और आसपास के शहरी इलाकों में अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पाई है।

राकांपा प्रमुख शरद पवार अपनी पार्टी की सीमाओं को जानते हैं, यही वजह है कि वह शिवसेना के साथ गठबंधन के लिए गए। पवार और ठाकरे परिवारों ने चुनाव के दौरान एक-दूसरे की आलोचना की हो सकती है, लेकिन उनके व्यक्तिगत समीकरण हमेशा अच्छे रहे हैं।

दिवंगत बाल ठाकरे ने एक विरोधी खेमे से होने के बावजूद राज्यसभा चुनाव में शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले को अपनी पार्टी का बिना शर्त समर्थन दिया था। शरद पवार ने अब पार्टी में मुख्यमंत्री पद को स्वीकार कर बालासाहेब से मित्रता निभाई है।

शरद पवार ने 1980 के दशक में अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन किया है। मुख्यमंत्री के रूप में, उन्होंने जनता पार्टी (जो बाद में भाजपा बन गई), सोशलिस्ट पार्टी, किसान और वर्कर्स पार्टी, और अन्य लोगों द्वारा समर्थित सरकार का नेतृत्व किया।

पवार ने सोनिया गांधी को बाहर से समर्थन देने के बजाय सरकार का हिस्सा बनने के लिए राजी कर लिया। यह सुनिश्चित करता है कि जबतक सत्ता सबके द्वारा साझा की जा रही है, गठबंधन की स्थिरता बनी रहेगी। जब तक पवार महाराष्ट्र की राजनीति के शीर्ष पर हैं, गठबंधन सरकार जीवित रहेगी क्योंकि उनके पास मतभेदों को दूर करने के लिए कद और क्षमता है।

पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने पहले कार्यकाल में, एकनाथ खडसे, प्रकाश मेहता, पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े, चंद्रशेखर बावनकुले और राज पुरोहित जैसे कई बड़े नेताओं को नज़रअंदाज़ किया। इससे न केवल 2014 में भाजपा के 122 विधायकों की संख्या घटकर 2019 में 105 हो गई, इसने राज्य में पार्टी की बढ़ती पहुँच को भी रोक दिया।

2014 में, कई छोटे-बड़े समुदायों ने भाजपा का साथ दिया, लेकिन 2019 में वे अलग हो गए।  प्रवर्तन निदेशालय द्वारा शरद पवार को नोटिस भेजने से OBC और मराठा-कुनबी समुदाय भाजपा से नाराज़ हो गए। फडणवीस के अभियान ने नारा दिया था “Mi punna yeiel” (मैं फिर से सीएम बनकर आऊंगा) ने गलत संकेत भेजे। इसने वे सत्ता के लिए लालची, अभिमानी और आत्मकेंद्रित लगे।

फडणवीस के अति आत्मविश्वास ने पवार की राजनीतिक क्षमता को कम करके आंका। भाजपा की पवार को निशाना बनाने की रणनीति विफल रही। चुनाव से पहले, इसने सक्रिय रूप से पवार के करीबी सहयोगियों और रिश्तेदारों को अपनी ओर खींचने से भाजपा का नुक्सान हुआ। इसने मतदाताओं को संदेश दिया कि 78 वर्षीय पवार एक घायल बाघ की तरह अकेला युद्ध लड़ रहे हैं। इसने उनके लिए बहुत सहानुभूति पैदा की – और एनसीपी,जिसके लिए चुनाव से पहले 20 सीटें भी हासिल करना निश्चित नहीं था, 54 सीटें जीतकर आयी।

फड़नवीस ने यह दावा किया कि पवार (मराठा-बहुजन) का राजनीतिक युग समाप्त हो गया है, और फड़नवीस (ब्राह्मण) का राजनीतिक युग शुरू हो गया है। इसने मराठा-कुनबी पिछड़े समुदाय के मतदाताओं को आक्रोशित किया, जिससे वे पवार के पीछे मजबूत हो गए।

भाजपा ने सहकारी नेटवर्क को नष्ट करने की कोशिश की, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ग्रामीण इलाकों में फडणवीस के खिलाफ गुस्सा फैल गया था। इसने ग्रामीण मराठा-कुनबी बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया। और, निश्चित रूप से, बारिश में पवार का भाषण भाजपा के लिए अंतिम झटका था।

फडणवीस ने मीडिया और पार्टी दोनों में अपने सलाहकारों और वफादारों की एक मंडली बना ली थी। इस मंडली ने जनता और फड़नवीस के बीच एक आभासी दीवार का निर्माण किया।

उन्होंने यह भी धारणा व्यक्त की कि वह केंद्र में एक बहुत बड़ी भूमिका के लिए आगे बढ़ सकते हैं।

  • राहुल यशस्वी

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