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महाराष्ट्र की महाभारत में कौन जीता-कौन हारा? आखिर क्यों हुआ ये युद्ध?

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के पैंतीस दिनों बाद राज्य में बहुमत वाली सरकार बनी जब उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। सिलसिलेवार नाटकीय घटनाक्रमों  के बाद तीन दशक पुराना भारतीय जनता पार्टी  और शिवसेना का गठबंधन टूट गया और अब दोनों दल एक दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं।

अंत में, महाराष्ट्र के इस राजनीतिक संघर्ष में एक ही पार्टी स्पष्ट विजेता बनकर उभरी। शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार के भविष्य की स्थिरता की धुरी है। कांग्रेस, NCP  और शिवसेना को एक साथ  लाना कोई आसान काम नहीं था, और NCP ने  ऐसा करके दिखाया। NCP  एमवीए सरकार में प्रमुख विभागों को भी अपने पास रखेगा।

राजनीतिक मोर्चे पर भी, एनसीपी राज्य में अग्रणी मराठा पार्टी के रूप में अपने कद को मजबूत करेगी। यदि गठबंधन एक या दो साल तक जीवित रहता है, तो कई व्यक्तिगत नेता जो NCP छोड़ चुके थे, वापस आ सकते हैं। शरद पवार का कद बढ़ा है, और पार्टी पश्चिमी महाराष्ट्र क्षेत्र में इसे भुनाने की कोशिश करेगी।

इस गठबंधन में कांग्रेस अनिच्छुक भागीदार रही है। उसे सत्ता के फलों में भागीदारी और सेना के साथ गठबंधन करके अपने मूल वोट बैंक को नाराज नहीं करना था। अभी के लिए, व्यावहारिक विचार पार्टी के अंदर जीत गए हैं। कथित तौर पर, इस कदम को अभी भी राहुल गांधी का समर्थन नहीं है। कांग्रेस को अपनी स्थिति का नियमित मूल्यांकन करना होगा, खासकर इस कदम के कारण अगर वो केरल में दबाव में आती है।

नतीजों के दिन से ही सेना की ओर से एकदम साफ हो गया था कि इसकी सबसे बड़ी चिंता पार्टी की ओर से सीएम बनना है। शुरू में, पार्टी द्वारा उठाए गए कड़े रुख को भाजपा ने गठबंधन सरकार में अधिक बड़ी हिस्सेदारी के रूप में देखा। इस अवसर पर, हालांकि, शिवसेना अपने इरादे को लेकर गंभीर थी। जबसे भाजपा के साथ गठबंधन किया गया था, तबसे पार्टी का जनाधार सिकुड़ रहा था। भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी की हमेशा अपना प्रभाव बढ़ाने की आकांक्षाएं होती हैं, जिसका अर्थ है कि उसके द्वारा विपक्ष और सहयोगी दलों के वोट आधार में सेंध मार के खुद का जनाधार बढ़ाना। – 2014 के बाद से दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनावों से ये काफी स्पष्ट था कि  राज्य में शिवसेना भाजपा से हार रही थी। शिवसेना मुंबई और प्रदेश के और उपनगरीय इलाकों में भाजपा के लिए अपनी राजनीतिक जमीन तेजी से खो रही थी।

जबकि शिवसेना को हमेशा एक हिंदूवादी ताकत के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन पार्टी का गठन इस तरह से नहीं हुआ था। शिवसेना क्षेत्रीय गौरव के संरक्षक के रूप में उभरी। 1970 और 80 के दशक में शहर में औद्योगिक विकास को रोकने का प्रयास करने वाले कम्युनिस्टों के खिलाफ इसने कड़े कदम उठाए। पार्टी ने प्रशासन, नौकरियों और राजनीति में मिट्टी के पुत्रों के लिए प्राथमिकता की वकालत की। नब्बे के दशक के बाद ही पार्टी हिंदुत्व के अजेंडे पर आगे बढ़ी।

राम जन्मभूमि के फैसले के साथ जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाने के बाद और नागरिक संहिता की दिशा में एकीकरण के कुछ कदम उठने से शिवसेना शायद यह सोच रही है कि हिंदुत्व के एजेंडे में पहले की तरह प्रतिध्वनि नहीं हो सकती है। वास्तव में, उस एजेंडे को खुद को पुनर्जीवित करना होगा – एक जिम्मेदारी जो पूरी तरह से भाजपा के साथ निहित है।

भाजपा के लिए भविष्य में क्या होगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि एमवीए कितने समय तक चलता है। देवेंद्र फड़नवीस को नए गठबंधन पर नियमित आधार पर दबाव बनाए रखना होगा। अजीत पवार के साथ उनके तीन-दिवसीय गठबंधन ने उनकी छवि ज़रूर कुछ हद तक धूमिल कर दी हो पर अधिकांश भाजपा मतदाताओं के इस तरह के अवसरवाद से बहुत परेशान होने की संभावना नहीं है।

हालांकि, यदि एमवीए अधिक समय  के लिए मजबूत होता है, तो भाजपा को अपनी वापसी की रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा, इसे ठीक करने के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे- जैसे जातिगत समीकरण, स्थानीय सहकारी निकायों की ताकत बढ़ाना, और पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा क्षेत्र के नेताओं को बढ़ावा देना।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा को अब महाराष्ट्र और देश के लिए हिंदुत्व के एजेंडे को फिर से परिभाषित करना होगा।

इस बीच, महाराष्ट्र में मतदाता एक स्थिर सरकार के साथ एक स्थिर शासन की उम्मीद करेंगे। सब्स्र बड़ी चिंता का विषय यह है कि मौजूदा बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट कैसे प्रभावित होते हैं। भारत का आर्थिक विकास दांव पर है – अधिकांश वर्षों में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 15% महाराष्ट्र से आता है।

राहुल यशस्वी

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