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योग और मार्शल आर्ट्स

कुछ वर्ष पूर्व चीन की यात्रा के दौरान शाओलिन जाने का मौका मिला और वह एक बहुत ही सुंदर अनुभव रहा। आज योग दिवस पर इस यात्रा का उल्लेख एक विशेष कारण से कर रहा हूँ जो इस लेख के समाप्त होते होते आपको समझ में आ जाएगा।

एक बौद्ध साधु “बुद्धभद्रा” करीब ४९५ ईश्वी सन में चीन के हेनान प्रान्त में राजा शोवेन के पास पहुंचे। उन्होंने राजा को बौद्ध धर्म से परिचित किया। राजा ने उनसे कहा की आप इस धर्म की शिक्षा उनके दरबार में दीजिये लेकिन बुद्धभद्रा ने मना कर दिया। राजा उनसे बहुत प्रभावित थे और उसका मुख्य कारण था बुद्धभद्र का “योग” का ज्ञान और अनुभव।

राजा ने बुद्धभद्रा को सॉन्ग पहाड़ी का इलाका जो करीब ५ वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है दे दिया और कहा कि इस स्थान में वो अपने ज्ञान और दक्षता के प्रचार के लिए एक धर्मस्थल का निर्माण करें।

इस स्थान को शाओलिन का नाम दिया गया और करीब तीस वर्ष में इस मठ का निर्माण हुआ। तीस वर्ष की अवधि के बाद जब इसका मठाधीस फांग चांग था तब एक और भारतीय बौद्ध साधु जिनका नाम बोधिधर्मा था और जो कुण्डलिनी योग और सामान्य योग क्रियाओं में पारंगत थे वो शाओलिन आये। उन्होंने फांग चांग से अनुरोध किया कि उनको शाओलिन मठ में रहने और अपने ज्ञान की शिक्षा देने की अनुमति दी जाए। फांग चांग ने इसके लिए मना कर दिया। बोधिधर्मा वहाँ से चले गए और पहाड़ियों के अंदर एक गुफा में नौ वर्ष तक ध्यान एवं तपस्या करते रहे। कहते हैं कि इन नौ वर्षों में बोधिधर्मा ने गुफा की जिस दीवार की तरफ मुँह करके यह कठोर तपस्या की थी उस दीवार पर उनकी आकृति सदैव के लिए चित्रित हो गई। यह गुफा अब एक पवित्र स्थान मानी जाती है और बोधिधर्मा की आकृति जिस दीवार पर चित्रित है उसको वहां से हटा कर मठ के मुख्य परिसर में स्थापित किया गया है जो आज भी देखी जा सकती है। 

इस नौ वर्ष के अंतराल के बाद फांग चांग ने बोधिधर्मा को शाओलिन में रहने का अधिकार दिया और बोधिधर्मा वहां बौद्ध धर्म के जनक बने।

बोधिधर्मा नौ वर्ष तक गुफा में योग के माध्यम से स्वयं को स्वस्थ और सुडौल रखे हुए थे लेकिन उन्होंने देखा कि शाओलिन के अधिकतर साधु शारीरिक समर्थता और सुडौलता लिए हुए नहीं थे।

बोधिधर्मा ने पाया कि अधिकतर साधु सेवा निवृत्त सैनिक थे और उनको आक्रामक शैली की शारीरिक शिक्षा मिली हुई थी।

बोधिधर्मा ने उनकी इस दक्षता के साथ योग के विभिन्न आसनों का समन्वय करके एक नई तकनीक विकसित की जो आत्मरक्षा, शारीरिक स्वस्थता और मष्तिष्क के संतुलन के लिए बहुत ही कारगर सहायक हुई। इस तकनीक को कुंग फु का नाम दिया गया जो समूचे विश्व में प्रसिद्ध हुई।

आज भी हज़ारों कि संख्या में वहां शैलानी जाते हैं, भारत के स्वर्णिम योगदान का अनुभव करते हैं।

मुझे उस विस्तृत, शांत, इतिहास को सामने रखने वाले स्थान पर एक विशेष अनुभूति हुई एक भारतीय होने नाते। मैं यह भी सोचता रहा कि हमारे अपने देश में जो योग को सम्मान मिलना चाहिए वो पिछले कुछ वर्षों में मिलना आरम्भ हुआ है लेकिन हमें इसको बहुत गंभीरता से अपने राष्ट्रनिर्माण एवं जनमानस के चरित्र निर्माण में उपयोग में लाना चाहिए।

भारत में अनिवार्य सैन्य सेवा तो नहीं है परन्तु योग को एक अनिवार्य शैक्षणिक विषय बनाने के बारे में विचार अवश्य होना चाहिए।

आज हमें इस योग दिवस पर इस विज्ञान के सामने नतमस्तक हो कर अपने जीवन में एक संकल्प लेना चाहिए की जिस विधा के पीछे पूरा विश्व किसी न किसी तरह जुड़ा हुआ है उसे अपने जीवन में जरूर स्थान दें और अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति का विकास करें।

– प्रमोद बिंयाला

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