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गिरीश कर्नाड का जाना एक सोच का अंत

हर कलाकार के भीतर एक विचार होता है और उस विचार का संचालन करते करते वह उसी विचार का संचालक मात्र हो जाता है। उसके सामने दर्शक होते हैं, पाठक होते हैं और वह अपने पाठकों और दर्शकों को कभी कभी अपने विचारों का गुलाम मान लेता है, ऐसे में आरम्भ होता है विचारों के आधार पर दर्शकों का विभाजन करना और पाठकों का विभाजन करना!

गिरीश कर्नाड ऐसे ही एक कलाकार हैं, जिन्होनें अभी हाल में सत्ता विरोधी वक्तव्यों से काफी सुर्खियाँ बटोरी थीं। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों से जब से दक्षिणपंथी सरकार केन्द्र में आई थी, तब से वह अधिकतर सरकार के विरोध में वक्तव्य देने में आगे रहते थे। अपने जीवन के 5 दशकों तक साहित्य और कला की दुनिया में सक्रिय रहे गिरीश कर्नाड ने न केवल साहित्य एवं कला के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित की थी बल्कि वह फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे थे।

यदि हाल के विवादित वक्तव्यों को छोड़ दिया जाए तो गिरीश कर्नाड का जीवन बहुत ही रचनात्मक विविधता से परिपूर्ण रहा। उन्हें कन्नड़ भाषा का प्रमुख स्तम्भ साहित्यकार माना जाता है।

वह वर्ष 2015 में तब लोगों के निशाने पर आए थे जब उन्होंने कर्नाटक सरकार द्वारा आयोजित टीपू सुलतान की जयन्ती में दक्षिणपंथियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि नायकों को जाति धर्म में नहीं बांटना चाहिए और यदि टीपू सुलतान हिन्दू होते तो शिवाजी जैसा कद उनका भी होता। भाजपा के साथ अपने वैचारिकी विरोध के कारण उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के गौवध पर प्रतिबन्ध का विरोध करते हुए बंगलुरु में गौमांस खाया था।

यही कारण था कि शायद वह अपने अंतिम समय में लोगों के निशाने पर आ गए थे। यह सत्य है कि जब कोई कलाकार आम जनता को अपने ही विचारों का गुलाम समझ लेता है तो वह अपनी सार्थकता खोने लगता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह एक महान अभिनेता और कार्यकर्ता थे। उनके निधन पर प्रधानमंत्री सहित अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने भी शोक व्यक्त किया है।  

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