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मंगरू पाहन की मृत्यु लिंचिंग में गिनी जाएगी क्या?

झारखंड इन दिनों चर्चा में है, वैसे तो किसी भी प्रदेश के चर्चा में रहने के कई कारण होते ही हैं, पर आजकल लिंचिंग के झूठे आरोप झेलता हुआ चर्चा में है। झूठे इसलिए क्योंकि यह सिलेक्टिव शोर था।

जब तबरेज के शोर में हम सब व्यस्त थे या व्यस्त कराए जा रहे थे, उससे बस 6 दिन पहले ही झारखंड में एक आदिवासी की मृत्यु कुछ व्यक्तियों के कारण हुई थी। यह मृत्यु भी साधारण नहीं थी, दरअसल यह एक हत्या थी, और यह हत्या एक बहुत ही आम कारण से हुई थी। यदि आपके घर के बाहर कुछ लोग खड़े होकर गांजा पी रहे हैं, तो आप क्या करेंगे? यदि आपके घर के बाहर कुछ लोग खड़े होकर गुंडागर्दी कर रहे हों तो आप क्या करेंगे? आप उनसे कहेंगे कि जाइये कहीं और जाकर यह काम करो। मगर कुछ लोग इसे नागवार मानते हैं। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं होता कि कोई उन्हें टोके। और यदि वह मुस्लिम हैं, तो इस समय वह इसे बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।

मंगरू पाहन एक मजदूर था, जो अर्गोरा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के अंतर्गत कद्रू क्षेत्र में सरना टोली का निवासी था। मंगरू के रिश्तेदारों का कहना है कि कुछ लोग घर के बाहर आए, जहां पर एक पेड़ है और वह गांजा पी रहे थे। मंगरू ने उन्हें रोका और कहा कि वह कहीं और जाएं, या रेलवे स्टेशन के बाहर जाकर पिए जहां पर कोई है नहीं। मगर पहले तो वह लोग बहस करने लगे और बाद में उनमें से एक ने उसे चाकू मार दिया। हम उसे अस्पताल ले गए जहां पर उसे मरा हुआ घोषित कर दिया।

गिरफ्तार किए गए लोग हैं मोहम्मद सज्जाद, आजम अंसारी और रमजान अंसारी !

अब प्रश्न उस जमात से है जो लोग तबरेज की मृत्यु पर शोर मचा रहे हैं, क्या उनके लिए आदिवासी मंगरू की जान की कोई कीमत नहीं है? यदि है तो बताएं कि वह उसके लिए शोर क्यों नहीं मचा रहे हैं?

आपके इसी झूठे शोर से भारत में मुसलमानों की स्थिति पर असर पड़ रहा है।

इस जमात के लिए उचित ही है कि यह हर देश तोड़ने वाली और समाज पर गलत असर डालने वाली घटना के साथ होती है या फिर वह घटना को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर पेश करती है। यदि इन लोगों ने अपनी आदतें नहीं सुधारीं तो आने वाले समय में इनकी बातों पर भरोसा बिलकुल भी नहीं किया जा सकेगा।

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