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लिंचिंग से नहीं दिल का दौरा पड़ने से हुई थी तबरेज की मृत्यु

झारखंड के तबरेज की बहुत चर्चाएँ हो गयी हैं। अब लगता है ज़िक्र करना बंद कर देना होगा। मगर ज़िक्र तो एक बात को लेकर होगा ही, एक बात और। बस और फिर तबरेज का किस्सा बंद। मगर एक तबरेज की सच्चाई से क्या होगा, यहाँ पर तो रोज़ तबरेज जैसी एक घटना रोज़ होती है। झारखंड में तबरेज अंसारी की पिटाई होती है। वह ऐसा महान इंसान है जिसके नाम पर न जाने कितने मुक़दमे दर्ज हैं। और तबरेज ही इतने महान नहीं थे, बल्कि उनके पिता जिन्हें लिंचिंग से मारे जाने की कहानी मीडिया गढ़ चुका है वह भी इतने ही महान थे। जब उनकी महानता की बात करते हैं तो पाते हैं कि उनकी महानता की कहानियां एक दो पन्ने में नहीं समा सकती हैं।  

इनकी कथित लिंचिंग से हुई मृत्यु से कुछ लेखक इतने दुखी हैं कि वह कलम तोड़ चुके हैं, लिखना तब तक के लिए छोड़ चुके हैं जब तक दूसरी लिंचिंग नहीं हो जाती। आई मीन, कथित लिंचिंग जिसमें मरने वाला मुसलमान है और मारने वाले कथित रूप से हिन्दू।

नहीं तो दिल्ली में वह डॉ. नारंग के मामले में नहीं बोले, मेरठ में लस्सी के पैसे मांगने पर लस्सी विक्रेता की पीट पीट कर हत्या के मामले में कुछ नहीं बोले और तो और ध्रुव त्यागी की हत्या पर भी नहीं बोले।

अब बोले तो ऐसे बोले कि जब पता चल गया कि तबरेज की मृत्यु पीटने से नहीं हुई, बल्कि उसकी मृत्यु तनाव के कारण दिल का दौरा पड़ने से हुई है, तब भी वह इसे लिंचिंग की घटना साबित करने में लगे हुए हैं। उनके लिए महान तबरेज एक संत थे, जो काफिर महतो के घर पर रात में चोरी करने का पुण्य कर्म करने गए थे। ऐसे महान संत को पुलिस के हवाले करना कितना बड़ा कुफ्र है, यह उनसे पूछिए।

और अभी तो वह जांच पर भी सवाल उठाएंगे कि जब हमने कह दिया कि तबरेज पीटने से मरा था तो डॉक्टर कौन होता है यह कहने वाला कि वह पीटने से नहीं मरा।

खाता न बही, जो इस देश का सेक्युलर कहे वही सही।

सोनाली मिश्रा

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